Wednesday, May 13, 2009

शिकायत




















जब कभी,
मेरे पैमाने में,
ख्वाइशों के कुछ बूंद छलक जाती हैं,
तुम्हारी यादों की खुशबू,
बहकी हुई हवाओं की तरह,
मेरे साँसों में बिखर जाती हैं,


मैं हर दायरे को भूल कर,
हर दरिये को लाँघ कर,
देर तक,
तुमसे सिफ़र से फलक तक की,
सारी बात करना चाहता हूँ;
हर नाजुक घड़ी को महफूज़ रख,
फिर से जीना चाहता हूँ;

और तुम्हारी ये शिकायत रहती है कि,
"उड़ान की आदत न डालो",
शाम ढलने पर, तकलीफ़ होती है...

Ugly

लोहा, लक्कड़, ताला, चक्कर घिच-पिच कर के बैठा है बाहर से चमचम करता है दिल अंदर से ugly है मौसम, पानी, सात समंदर गलियों गलियों घूमा है...