Thursday, February 19, 2009

पगली चूड़ी

अपने सरगम पर इठलाती,
जी भर हंसती, चुप हो जाती।
रेत पे संवरी, नदी के तट पर,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
मैं कलम नही, और न कोई दर्पण,
फिर भी तेरे उलझे धागों से,
मैंने अपना आकाश बुना है।
रंगोली के रंग में खिलती,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;


बातूनी इस चूड़ी से,
मैं डरता भी हूँ, लड़ता भी;
उसने कितनो को पगला बोला है,
ये तो कभी ना बतला पाऊंगा,
खनक पे भटके प्यासे प्याले,
गिन कर भी क्या कर पाऊंगा...
बड़ी बांवरी है, कागज की कश्ती,
पाकर भी इसे घबराऊंगा।

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