Wednesday, February 04, 2009

परिचित अजनबी

ख्वाइशें फिर से मचलकर,
वक़्त से लड़ने लगी...
क्यूँ अक्स अपना तुझमे देखा?
मुझसे पूछा करने लगी...

अजनबी तुम आइना नही,
फिर परिचय अपना कैसा है?
आइना हंस पड़ा फिर,
शायद ...कोई मेरे जैसा है।

वक़्त कुछ पल,
मेरी मुट्ठी में थम जा,
मै अनाडी..पर तुझे तो समझ है,
लुक्का छिपी अजनबी से,
थोड़ा अनूठा थोड़ा सहज है...



इश्क़ मुहब्बत वाला लौंडा जब झंडा लेकर घूमने लगा

2012 के मई की चिलचिलाती गर्मी चीटियों की तरह शरीर पर चुभ रही थी| ज़मीन एक एक क़तरा पानी के लिए ललचाये निग़ाहों से आसमान की तरफ़ ताक रहा था, लेक...