Friday, September 18, 2009

बेतुके

दर्द की हँसी

वक्त के साथ साथ

मुरझा गई।


आंधी का पंजा

बहुत नुकीला था;

ज़ख्मी ढिबरी

काँप काँप कर हार गई।


झील के आंसू

बहते बहते सूख गए;

ज़ालिम पतझर,

पल्लव उसके कल नोंच गया।


तेरी चिट्ठी,

बारिश में वो पढता था ,

पिघले पन्ने अंगीठी में,

कल बुझे मिले ...


4 comments:

VaRtIkA said...

zindagi shayad inn betuke lamhon mein hi sabse adhik kareeb aur spast nazar aati hai......

iss betukepann mein dard ke tukde badi khoobsoorti se piroye hain aapne....


"झील के आंसू बहते बहते सूख गए;
ज़ालिम पतझर,पल्लव उसके कल नोंच गया।"
yeh khayaal to bas laajawaab hai.... picturesque....

Deepak Agarwal said...

hmmmm..............

vakrachakshu said...

kahna padega ... 'Tej ho gae ho '

PulseOfIndia said...

nice one.....specially the lines

झील के आंसू बहते बहते सूख गए;
ज़ालिम पतझर,पल्लव उसके कल नोंच गया

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...