Saturday, July 18, 2009

रिश्तें

चाँद जब
सर्द रातों में,
अंगराई
लेने के बहाने,
मेरे जिस्म पर,
ओस की अलसाई बूंदे
छोड़ आता है;
मेरी रूह,
उस मीठे एहसास में,
बेचैन होकर उलझ जाती है।

रिश्तों की सरहदें,
वक्त की तरह
बेरहम होती हैं।
जिन्हें लांघने के बाद,
लौटना मुमकिन नहीं;
और,
सरहद के पीछे छूटी बस्तीयाँ,
मध्धम मध्धम पिघलकर
यादों में सिमट कर रह जातीं हैं...

4 comments:

abhishek anand said...

bahut khoob......ab "kaviraj" naam se blog likho

VaRtIkA said...

bahut sunder......

amaresh's oeuvre said...

kaviraj ki jay ho...

Deepak Agarwal said...

Its too much unplatonic and thats why I like the feeling

इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद...