Saturday, July 18, 2009

रिश्तें

चाँद जब
सर्द रातों में,
अंगराई
लेने के बहाने,
मेरे जिस्म पर,
ओस की अलसाई बूंदे
छोड़ आता है;
मेरी रूह,
उस मीठे एहसास में,
बेचैन होकर उलझ जाती है।

रिश्तों की सरहदें,
वक्त की तरह
बेरहम होती हैं।
जिन्हें लांघने के बाद,
लौटना मुमकिन नहीं;
और,
सरहद के पीछे छूटी बस्तीयाँ,
मध्धम मध्धम पिघलकर
यादों में सिमट कर रह जातीं हैं...

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...