Thursday, May 21, 2009

समाज















तुम,
मैं,
और बीच में,
आधे चाँद की ख्वाइश;
टेढ़ी मेढ़ी सच्चाई;
विचारों के विवाद;
लेकिन,
बस,
आधी रोटी की हकीकत।

तुम,
मैं,
और बीच में,
वही सड़क,
शाश्वत चलती हुई।

तुम थकते नही,
मैं पार करना नही चाहता।

जब थक जाऊंगा,
साँसें फ़ूल जाएँगी,
ज़ज्बा ख़त्म हो जाएगा,
उस पार आकर,
मैं भी,
तुम बन जाऊंगा...

3 comments:

shanky said...

its again awesome man...
But i dont want to call it a masterpiece...
coz it will make you complacent...i hope you get point...
I am becoming a fan of yous..

VaRtIkA said...

hmmm...

Deepak Agarwal said...

this time again you tried to be very hard on you.............but sorry you failed in your quest.........

for being hard on yourself one has to be soft on others.....

But I like it because you didn't try to forgive yourself...........

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.