Wednesday, May 13, 2009

शिकायत




















जब कभी,
मेरे पैमाने में,
ख्वाइशों के कुछ बूंद छलक जाती हैं,
तुम्हारी यादों की खुशबू,
बहकी हुई हवाओं की तरह,
मेरे साँसों में बिखर जाती हैं,


मैं हर दायरे को भूल कर,
हर दरिये को लाँघ कर,
देर तक,
तुमसे सिफ़र से फलक तक की,
सारी बात करना चाहता हूँ;
हर नाजुक घड़ी को महफूज़ रख,
फिर से जीना चाहता हूँ;

और तुम्हारी ये शिकायत रहती है कि,
"उड़ान की आदत न डालो",
शाम ढलने पर, तकलीफ़ होती है...

4 comments:

VaRtIkA said...

wow... wat a lovely taouch u have lended to ur poems :) ....or i mst say ur love has lended to ur thoughts.... :p

shanky said...

its great...
great ending..
i dont have poetic words to describe it

crazy devil said...

@ shanky - thanks :)

Metamanish said...

kya poem hai..