Saturday, April 25, 2009

क्यूं चौक सा गया था मैं














सांझ
को किसी मोड़ से,
सौंधी सी खुशबू आने लगी,
जिंदगी वहाँ थम गई,
घबराने लगी.. चुप हुई...मुस्कुराकर शरमाने लगी।

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूं चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

लडखडाती राहें पगली,
मोड़ पर थम जाती हैं,
अनकहे इंतज़ार की ख्वाइश में गुम जाती हैं।

बिंदास था, कुछ लम्हों के अल्फास में,
मैं खो गया।
उस सुस्त चलती मोड़ पर,
धीमे आहट से कुछ हो गया...

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूँ चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

3 comments:

amaresh's oeuvre said...

wah mere dost..mere kavi...chaa gayo....aise hi likhat rahi to bihar ko ek din tumpe naaj hoga..
good going!!!

VaRtIkA said...

hmmm... acchi hai... aur acchi likh sakte ho tum ye bhi humein pata hai.... :)

Metamanish said...

i know that u know the comment!if not then ping!

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...