Saturday, November 28, 2009

खोया खोया चाँद

फटे जूते,
जिंदगी को,
ठोकरों में लपेट कर,
गलियों में खो गए,

करवटें भारी भारी,
ख्वाब सारे,
बिस्तरों की सिलवटों में समेट कर,
बेफ़िकर ही सो गयें,

रात भर,
मैं जला, और जली, बेवफ़ा सिगरेट,
छल्लों की तलब में जलता रहा,
भूखा पापी पेट...सूखा भारी पेट।

खोया खोया चाँद को चूमने को,
खुशबू भरे सांझ यूँही घूमने को;
जगी फिर वही तलाश है...

नन्ही नन्ही बूंद में भीगने को,
सारी रात बेतूका चीखने को;
उतावला उदास है...

ये नोचने की चाहतें,
ये चाहतों का सिलसिला,
ये हसरतों की करवटें,
ये करवटों के दास्ताँ,

आईने में सूरतें, बिस्तरों में करवटें,
मोम बन पिघल पड़ेंगी,
रात भर,
मैं जलूँगा और बेवफ़ा सिगेरेट ...
छल्लों की तलब में जलेगा,
पापी भूखा पेट।

Friday, October 09, 2009

कल आधी रात

कल आधी रात,
इक कतरा चाँद, एक तिनका अरमां
हौले, हौले पिघलकर,
पैमाने में छलक गयें;

कल आधी रात,
इक टुकड़ा अब्र, और कुछ बिखरे तारे,
सतरंगी बनकर
मुझमे बहक गयें।

पॉकेट में थे, मेरे,
कुछ सिक्के पुराने,
और
मुट्ठी भर बटोरे, कुछ चमकीले पत्थर।
आधी विरासत बचपन से बटोरे,
कल आधी रात,
तुम्हे सौंप आया।

तेरे आधे सपने,
मेरी आधी ख्वाइश,
ओस में आधे भीगे पड़े थें।

कल
आधी रात,
एक आधी पायल, और,
आधा सा पिघला रेशम का पत्ता,
एक शाख़ की छाव में,
आधे - आधे लिपट गयें।

कल आधी रात,
आधी तेरी पलकें,
आधी मेरी सासें,
अर्श पर सजी,
इक आधी नज़्म में सिमट गयें...

Friday, September 18, 2009

बेतुके

दर्द की हँसी

वक्त के साथ साथ

मुरझा गई।


आंधी का पंजा

बहुत नुकीला था;

ज़ख्मी ढिबरी

काँप काँप कर हार गई।


झील के आंसू

बहते बहते सूख गए;

ज़ालिम पतझर,

पल्लव उसके कल नोंच गया।


तेरी चिट्ठी,

बारिश में वो पढता था ,

पिघले पन्ने अंगीठी में,

कल बुझे मिले ...


Wednesday, September 16, 2009

चोट

तुम्हारे विचारों और व्यक्तित्व पर,
जब भी
गहराई से विश्लेषण की बात उठती है,
दुनिया और भी खोखली दिखती है।

सम्भव है,
मेरी विकृत बुद्धि,
सच के दूसरे पहलू से वंचित रह जाती है,
विनाश और विध्वंश में उलझकर,
मुर्छित, हर्षित और मंद सड़ जाती है;

परन्तु,
साम्यवाद और समाजवाद का वस्त्र,
सिद्धांत और विनय का शस्त्र,
उतना ही मैला
उतना ही आधार हीन दिखता है;
जब,
किसी अपरिचित के घाव को देख,
तुम भौं सिकोड़ कर निर्माण के गीत गाते हो।

तब शायद,
विवादों और कर्तव्य के बोझ में उलझे सारे पृष्ट,
आडम्बर की परिधि में बंधी तुम्हारी दृष्टि;
मेरे स्वार्थ और निराशा की काली दुनिया के समक्ष,
फीके पड़ जाते हैं।

Saturday, August 29, 2009

स्वार्थी

उस रात,
गोद में उठाकर,
अपने बच्चे से अटपटी बातें करती माँ की आँखों में,
शायद,
मैंने वैसा ही कुछ देखा था,
जैसा आज,
चाय की चुस्कियों के संग,
अपने पुरानी यादों पर खिलखिलाते,
और,
बचे खुचे दांतों के बीच,
मोर की तरह फडफडाते
उस बुजुर्ग के होठो में देखा होगा।

हर बार,
निस्वार्थ बहते
इन झरनों को,
मैं अपनी कल्पनाओ में कैद करना चाहता हूँ;
और हर बार,
ऐसा करते ही,
मैं थोड़ा और स्वार्थी बन जाता हूँ।

Friday, August 28, 2009

इंतज़ार

हर रात,
तुम्हारी आहटों का इंतज़ार रहता है;

सोचता हूँ,
मेरी पलकें
थक कर,
जब अलसाई बाती की तरह बुझ जायेंगी,
तुम,
चुपके से आकर,
मेरे शब्दों को जूठा कर दोगी।

और सुबह,
धूप की छन छन
गुदगुदाकर,
जब मुझे चिढ़ाने को बेताब हो जाएँ;
मैं टूटे आवारा पत्तों की तरह,
फ़ुर्सत से,
मदहोशी में हौले हौले बहता हुआ,
सुबह से शाम गुज़र दूँ;

और,
मेरे नज्मों की खुशबू,
वादियों में सहमे बादलों की तरह,
आहिस्ता आहिस्ता फैलने लगे...

Saturday, August 08, 2009

इस रात वक्त क्यूँ थम गया है?

बूझते चिरागों की बेबसी में,
ख्वाइश का साया खोने लगा है।
किताबों की दुनिया का बेखौफ़ ज़ज्बा,
बूझी राख़ बन कर सोने लगा है।

अंधेरे में लिपटे आइनों की हँसी से,
यादों की तस्वीर जलने लगी है,
मैखाने में छिप के रोने गया था,
शहर में मातम भी बिकने लगा है।

इस रात वक्त क्यूँ थम गया है?
सुबह तक मैं भी ढल पडूंगा,
बासी रोटी निगलकर भूख मर गई अगर,
सुनसान गलियों में चल पडूंगा।

Saturday, July 18, 2009

रिश्तें

चाँद जब
सर्द रातों में,
अंगराई
लेने के बहाने,
मेरे जिस्म पर,
ओस की अलसाई बूंदे
छोड़ आता है;
मेरी रूह,
उस मीठे एहसास में,
बेचैन होकर उलझ जाती है।

रिश्तों की सरहदें,
वक्त की तरह
बेरहम होती हैं।
जिन्हें लांघने के बाद,
लौटना मुमकिन नहीं;
और,
सरहद के पीछे छूटी बस्तीयाँ,
मध्धम मध्धम पिघलकर
यादों में सिमट कर रह जातीं हैं...

Saturday, June 20, 2009

प्रश्न पुराना है।

प्रश्न पुराना है।

शायद,
शंख की गूंज की तरह,
हर किसी के,
नस नस में बहता होगा;

घिसता नहीं,
क्यूंकि इसकी चोट,
हर बार उतना ही घाव देती है।

मैं,
कौन, क्यूँ - मैं!

कोई समीकरण,
किसी समीकरण का हल?

एक प्रणाली में,
अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए,
प्रमाणपत्र छपवाता हूँ,
दस्तावेजों के लिबास में,
लिपटकर,
अपनी नीलामी लगवाता हूँ।

गुत्थियाँ सुलझाने के प्रयास में,
गुत्थियों में लिपटे शतरंज का बिसात बिछाकर,
हर जीते हुए दाव पर,
अपनी औकात से दोगुना आवाज़ लगाता हूँ।
और,
हार जाने पार,
झूठे किस्सों का उलझा हुआ शहर बनाकर खुश हो जाता हूँ।

मेरी परिभाषा,
भीख में मांगे हुए,
और भीख में दिए गए,
रिश्तों के बिना अधूरी है।
कड़वा लगने के डर से,
मैं इस सच को भी निगल जाता हूँ।

मेरे सपनो की पतंग,
उड़ता है,
सूरज को चूमना चाहता है;
पर,
हवा के रुकते हीं,
डोर ढीली पर जाती है,
कागज के मामूली पन्ने की तरह,
बापस लौट आता हूँ।

शायद,
किसी और के स्वप्न का,
छोटा सा पात्र हूँ;
उसके नींद खुलते हीं गायब हो जाऊंगा।

Friday, June 05, 2009

तेरे किस्से भी ख़रीदे थे रे बन्दे













अंधी
गलियों में हज़ारों,
प्यासे चूल्हे जलते हैं;
भूखे कुँए में सभी बेआबरु घुट कर मरते है।

इंसान की फ़ितरत बता कर,
भीख को आदत सुना कर,
तुमने उनको ठुकरा दिया था,
तुमने सब झूठला दिया था।

तेरे किस्से भी ख़रीदे थे रे बन्दे,
तेरे ही दरबार से;

हकीक़त की आंधी में जब,
असूलो का चोला,तेरा ही
चूभा था तुझे और,
अंधेरे कुँए में,
डुबकी लगाकर,
तुम,
दुनिया की महफ़िल में शामिल हुए थे।

बेच आया,
तेरे सारे किस्से,
वक्त के बाज़ार में...

Thursday, May 21, 2009

समाज















तुम,
मैं,
और बीच में,
आधे चाँद की ख्वाइश;
टेढ़ी मेढ़ी सच्चाई;
विचारों के विवाद;
लेकिन,
बस,
आधी रोटी की हकीकत।

तुम,
मैं,
और बीच में,
वही सड़क,
शाश्वत चलती हुई।

तुम थकते नही,
मैं पार करना नही चाहता।

जब थक जाऊंगा,
साँसें फ़ूल जाएँगी,
ज़ज्बा ख़त्म हो जाएगा,
उस पार आकर,
मैं भी,
तुम बन जाऊंगा...

Sunday, May 17, 2009

जिदद




















खण्डहर
के सख्त टूटे जिस्म में,
उस कोने में,
गर्द की परतों के निचे,
एक चिराग़ दफ़न था;
उसके अरमानों की नब्ज,
ख़यालों के कश्मकश में दम तोड़ने लगी थी।

तुम्हारी फूँक ने शायद,
चिराग़ में रौशनी डाल दी है।

अब,
खण्डहर
की जिदद है कि,
तुम्हारा एहसास
पुराने किस्सों की तरह,
ख्वाइशों के जिन्न को जगा सकता है।

Wednesday, May 13, 2009

शिकायत




















जब कभी,
मेरे पैमाने में,
ख्वाइशों के कुछ बूंद छलक जाती हैं,
तुम्हारी यादों की खुशबू,
बहकी हुई हवाओं की तरह,
मेरे साँसों में बिखर जाती हैं,


मैं हर दायरे को भूल कर,
हर दरिये को लाँघ कर,
देर तक,
तुमसे सिफ़र से फलक तक की,
सारी बात करना चाहता हूँ;
हर नाजुक घड़ी को महफूज़ रख,
फिर से जीना चाहता हूँ;

और तुम्हारी ये शिकायत रहती है कि,
"उड़ान की आदत न डालो",
शाम ढलने पर, तकलीफ़ होती है...

Saturday, May 09, 2009

तस्वीर

कल देर तक,
चुपचाप सिमट कर बैठा रहा,
मैं आँगन में अपने;

हलकी सी मदहोशी थी,
और मीठी सी एक बेचैनी,
चाहत और मुस्कराहट की लुक्काछिपी,
और लफ़्ज़ो की खिचातानी।

शायद,
तेरे एहसास के ठंडे छीटें पड़े थे,
और रेशम के कुछ शब्द गिरे थें,
रूह पर मेरे।

सर्द धुंध का सफ़ेद परदा,
और उस पार तुम;
कभी अजनबी और कभी पुरानी पहचान वाली,
दिख रही थी...

Friday, May 01, 2009

Who is your Daddy


Election fever in India (currently more pandemic than the Swine flu) has once again shifted the pan of balance in favour of slothful Indian bourgeoisie. Interestingly, celebrities from every corner of Indian subcontinent are displaying their sporadic reverence to the masses. While Hema Malini was spotted struggling against flies and heat in some village to convey aaj basanti ke ijjat ka sawal hai, Sanjay Dutt was heard propagating Gandhigiri and Jadu ki Jhappi.

In a concurrent development, IPL (floundering to justify its origin, name, vision and motto) , the worshipped crickets were traded, ill treated and publicly insulted by their owners for their failures. The gems of nation are celebrated more as people’s personal entertainment paraphernalia and gambling cards.

People in the service industry fear to the emotion and irrelevant arguments of western clients. Nature of jobs and employment rate in the developing nations depend of the algebra of western economy. The western economy is driven by liquidity, credit availability and banking systems. Bankers, business tycoons, consultants and traders anticipate China, India and Middle East as their potential business spot. The formula for investment includes several factors of local demand. Big fishes from western economy offer all sort of lucrative offer to persuade the middle class of developing nations. FMCG giants pays millions to celebrities with flurry of stupid, irrational and unrealistic advertisement campaigns to coax the middle class of developing nations.

Ironically, the middle class is the most neglected, struggling, dissatisfied and unnoticed mob.

Most of the artists, who claim themselves to be mavericks and iconoclasts have to struggle for their existence. The primitive requirement for any such launch pads or platforms is to cater the public demand. The desire and quest to change the world redefines in changing themselves.

Ironically, most of the boasted achievements of such artists include the art at which he wanted to avoid or mock at.

Picasso says “I myself, since the advent of Cubism, have fed these fellows what they wanted and satisfied these critics with all the ridiculous ideas that have passed through my mind. The less they understood them, the more they admired me. Through amusing myself with all these absurd farces, I became celebrated, and very rapidly. For a painter, celebrity means sales and consequent affluence. Today, as you know, I am celebrated, I am rich. But when I am alone, I do not have the effrontery to consider myself an artist at all, not in the grand old meaning of the word: Giotto, Titian, Rembrandt, Goya were great painters. I am only a public clown - a mountebank. I have understood my time and have exploited the imbecility, the vanity, the greed of my contemporaries. It is a bitter confession, this confession of mine, more painful than it may seem. But at least and at last it does have the merit of being honest. (Pablo Picasso, 1952)”

The series of arguments related to these events boil down to a simple question “Who is your Daddy”

Saturday, April 25, 2009

क्यूं चौक सा गया था मैं














सांझ
को किसी मोड़ से,
सौंधी सी खुशबू आने लगी,
जिंदगी वहाँ थम गई,
घबराने लगी.. चुप हुई...मुस्कुराकर शरमाने लगी।

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूं चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

लडखडाती राहें पगली,
मोड़ पर थम जाती हैं,
अनकहे इंतज़ार की ख्वाइश में गुम जाती हैं।

बिंदास था, कुछ लम्हों के अल्फास में,
मैं खो गया।
उस सुस्त चलती मोड़ पर,
धीमे आहट से कुछ हो गया...

क्या पता,
उस शाम ढलती मोड़ पर
क्यूँ चौक सा गया था मैं,
क्यूँ पता,
उस ओस से टकराकर,
खामोश सा हो गया था मैं...

Monday, April 06, 2009

मैं बस एक राज़ हूँ,

मैं बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा,
तेरे कूचे में भटकता हुआ,
कोई बदनाम ज़ख्म हो जाऊंगा।

मेरे प्याले से तेरे रूह की प्यास ना बुझी,
अब मैखाने में मनाया हुआ रस्म हो जाऊंगा
वक़्त भी मसलने की कोशिश क्यूँ करेगा,
दीवारों में दरार बन ख़त्म हो जाऊंगा,

ख्यालों में उलझी हुई, नज़्म तुम समझो,
या चादर में लिपटा पागल कोई पतझड़,
किसी महफ़िल में उड़ाया हुआ,
एक जशन हो जाऊंगा।

मैं
बस एक राज़ हूँ,
एक दिन गुमनाम दफ़्न हो जाऊंगा

Monday, March 30, 2009

London Calling...

दर्द की मीठी, मीठी
ठंडी खुशबू,
और साथ तुम, रात तुम,
नर्म धुप की पगली चादर,

सुबह चाँदनी बन पिघलती ओस सी,
और,
जिंदगी अंगडाईयाँ लेती
तुमसे टकराकर...
और साथ तुम, रात तुम;

मैं वहां, कुछ बहुत छोड़ आया,
और यहाँ,
भीड़ में,
खोजता हूँ,
smiley , और सपनो का आधा हिस्सा

और साथ तुम, रात तुम,
रहती....
रहती शायद....

खेल में, रेल में
काश फिर लौट आए लम्हें
और साथ तुम, रात तुम,
रहती....
रहती शायद...

Saturday, March 21, 2009

कल रात बड़ी तूफ़ानी थी

कल रात बड़ी तूफ़ानी थी,
बस सैलाबों की होली थी,
शहर का साया सोया था,
मैंने खेली आँख मिचौली थी...

गर्दिश की परवाह नही,
न अफ़्सानो की ख्वाइश थी,
हया बहा किसी दरिये में,
मैंने ख़ुद की लगायी नुमाइश थी।

सब भूलना आसान इतना होता नही है,
जख्म तो भर जाता है,
वक्त के बाज़ार में,
दाग लेकिन अपना ज़ालिम छोड़ जाता है।

कल रात बड़ी तूफ़ानी थी,
मैं गंगा तट पर,
मोक्ष मांगने खड़ा रहा,
निराकार रूप के अन्तरमन का,
अर्थ जानने किसी घाट पर पड़ा रहा।

हिमालय सत्य जानता ही होगा,
सब उससे ही तो पूछने जाते हैं;
गीता के कुछ पाठ जानकर,
मैं धनुष तानकर,
हिम खंड पर चढ़ा रहा...

कल रात बड़ी तूफ़ानी थी

हर शाम, एक गुमनाम चिडिया


हर शाम,
एक गुमनाम चिड़िया,
किसी नए फ़लक तक उड़ान के पश्चात्, घोसले में लौटती थी,
नन्ही उँगलियों से टाईपराइटर पर फुदक कर,
कुछ नए शब्द खोजती थी।

मैंने पढ़ा, सुना और तस्वीरों में देखा है,
ये दुनिया,
जिंदगी की तरह गोल, बिल्कुल गोल दिखती है;
तुम बहुत तेज़ हा धीरे चलोगे,
वापस वहीँ पहुँच जाऊगे।

शब्दों के मेले से चिड़िया,
नए रिश्ते, नई स्याही लाती थी,
नन्ही उँगलियों में सपने दबाकर,
टाईपराइटर पर फुदकती,
अपने आँगन में, स्नेह का चादर बिछाती थी।

ये बादल भी, कितने पागल होते हैं;
मांग कर और छीन कर, कतरा कतरा पानी का,
दूर देश से लाते हैं;
प्यासी धरती को देख तड़पता,
पल भर में बह जाते हैं।

टाईपराइटर के नए अक्षर,
नई स्याही, नया पेपर
नए बहने, नए विचार,
नई रचना पर वही आधार...

हर शाम एक गुमनाम चिड़िया,
वही धुन लिख जाती थी,
फुदक कर फिर टहनियों पर,
प्रियतम को सुनती थी।

Sunday, March 08, 2009

Book Mark



यूँ तो अक्सर,
संवेदनाएं...
हावी तुमपर रहती हैं,
पर,
इस शाम जन्मे,
अपने बेचैनी के अनल में,
मुझको चुपके झोंक देना;

पन्नो में सिलवट पड़े तो,
शब्द,
विचारों से लड़ पड़ेंगे,
कर दफ़न मेरी ख्वाइशें,
तुम युद्ध को बस रोक लेना...

Sunday, March 01, 2009

एहसास के टुकड़े

वक्त ख़ुद बेवक्त
हमारे लिए,
उपहार में, सूखी टहनी छोड़ जाता है;
एक झटके में जाने,
कितने रस्ते, कितने रिश्ते मोड़ जाता है...


लोग घाव से बहते अपने लहू से,
दर्द को कभी सींचते है,
या हरे चादर में छिपाकर,
हंसके ख़ुद को नोचते है...

इंसान को छोटी चीज़ें खीचने का कीडा होता है,
टहनियों को वृक्ष, और वृक्ष को अंतरिक्ष बनाता है,
हर बार अपने हाथों में किल ठोकता है;
ख़ुद को खुश रखने के लिए,
रह रह कर अपना दर्द सुनाता है।


संघर्ष की पोटली, herosim का एहसास,
वक्त की टहनियां,
झोले भर बकवास..

Saturday, February 28, 2009

Professional Mails

For an outsourcing service industry, the number of so called professional circulating mail was an enigma for me. I thought to understand the physics behind it and wrote some equations. The result was interesting...

The market forces always defined in terms of supply and demand.

So, for an outsourcing industry the forces behind number of such mails
= modulus of (Demand - Supply)

And, the fluctuation of market depends on large difference of supply and demand. Therefore, a negative factor should be present.

Mails = - modulus of (Demand - Supply)

Demand = (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others) * ( Factor of Cost ) ^n

Supply = (Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m, where m and n are some variables.

Therefore, Mails = - modulus of (Global GDP + Currency fluctuations + Political Conditions + Socio-Economic Conditions + Others)* ( Factor of Cost )^ n - Local GDP + Labour Force + quality*efficiency*client satisfaction)* ( Factor of Cost ) ^m

For an normal economic condition n=m=some constant
Mails = - modulus of (A) * ( Factor of Cost )^n - (B)* ( Factor of Cost ) ^m
= - ( Factor of Cost ) * Some Constants

Factor of Cost is a variable.

Thus mails = - a one degree variable* Constant

This is an S.H.M . If market fluctuates more the equation takes logarithmic or exponential form.

Tuesday, February 24, 2009

चौकड़ी

I was trying to experiment with style of poems. It came in my mind to design 4 liner poem, where the first three lines will define same object through different subjects (Science, Arts, Maths..). The last one will be philosophical end to these. I thought to call it "चौकड़ी".

example - चाँद

खरबों किलोमीटर दूर होगा कोई मुझसे,
मेरे बेटे के खिलोने जैसा दिखता है वो,
फिर भी पूजती हूँ उसे, नत् होती हूँ,

खुद से ऊपर बैठा हर कोई बड़ा ही होता है.

By- वर्तिका

Wallet

So many murders for leather to preserve fate,

Handy, trendy, branded, I prefer it for my date,

My wallet is wet in tears, have recession in its eyes,


We shrink our life as we grow up in size.




Try your hands....

Thursday, February 19, 2009

पगली चूड़ी

अपने सरगम पर इठलाती,
जी भर हंसती, चुप हो जाती।
रेत पे संवरी, नदी के तट पर,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;
मैं कलम नही, और न कोई दर्पण,
फिर भी तेरे उलझे धागों से,
मैंने अपना आकाश बुना है।
रंगोली के रंग में खिलती,
पगली चूड़ी का स्पव्न सुना है;


बातूनी इस चूड़ी से,
मैं डरता भी हूँ, लड़ता भी;
उसने कितनो को पगला बोला है,
ये तो कभी ना बतला पाऊंगा,
खनक पे भटके प्यासे प्याले,
गिन कर भी क्या कर पाऊंगा...
बड़ी बांवरी है, कागज की कश्ती,
पाकर भी इसे घबराऊंगा।

Thursday, February 12, 2009

Black Blood - Fingers

I can hear some fingers,

Have you heard them too…

Please do not disturb them,

It will all turn blue….

The fingers are boasting

They have cracked some digital codes,

Infuse some enduring patience,

Soon, they will format the old roads

Hey…

No, I am not lost;

Not even busy and baffled in booze,

I can’t follow the fingers,

I dreamed them, fixing me in screws…

Hey…

I am not running,

I’ve just avoided the taps,

I don’t want the bubble of life,

To smother me in gaps

The fingers are calling,

Have you heard them too?

I can hear some fingers,

Have you heard them too…

Friday, February 06, 2009

Black Blood


Do you think, I like the taste of the wall?

Do you think, I fear every sardonic call?

So you think, I smell and hide a lot…

Do you think, I care for your thought?

The chains are cold, dry and silent

And I know,

They offered you some soothing,

Dream proof treatment

Hey…

I am not sorry to refuse the offer of your shoe

I am not sorry for no time to hear you.

Its not some grass, its not any fatuous ebriety,

I am not sorry to refuse you are pretty

Do you think, in the dessert I will drink the paints?

Do you think I will sell my sin to saints?

So you think I am jumbled in my dots,

Do you think, I care for your thought?

Wednesday, February 04, 2009

परिचित अजनबी

ख्वाइशें फिर से मचलकर,
वक़्त से लड़ने लगी...
क्यूँ अक्स अपना तुझमे देखा?
मुझसे पूछा करने लगी...

अजनबी तुम आइना नही,
फिर परिचय अपना कैसा है?
आइना हंस पड़ा फिर,
शायद ...कोई मेरे जैसा है।

वक़्त कुछ पल,
मेरी मुट्ठी में थम जा,
मै अनाडी..पर तुझे तो समझ है,
लुक्का छिपी अजनबी से,
थोड़ा अनूठा थोड़ा सहज है...



Monday, January 19, 2009

दादा जी के लिए

बहुत अरसा तो नहीं गुजरा,
न ही इतिहास का कोई ग्रन्थ ख़त्म हुआ है,
मुझे अब भी याद है...
अक्सर,
भीड़ में उंगली पकड़कर,
तुम बचाते थे मुझे,
अंश अपना गर्व से कहते मुझे;
और,छिपा कर गुब्बर्रों में,
बूढे कंधो पर घुमाते थे मुझे।

बूढी झिलमिल आँखों का,
मैं कभी स्वाभिमान था,
मीठे ख्यालों में बुने कहानियो का,
कभी कृष्ण तो ...
कभी राम था।

आज अरसो बाद भी,
तुम्हारी उँगलियों का स्नेह,
और कहानियो का स्पर्श,
मुझमे शेष है।

तुम खो नहीं सकते,
भीड़ और तन्हाई में,
उंगली मेरी,
तुमको खोज लेंगी...

Saturday, January 10, 2009

What an Idea Sirjee....

Economic Meltdown, Inflation, Terrorism ...



What should a common man do...?

.
.
.
.
.
.
.
.
Inject mobile connection instead of any blood transfusion



बुझने दो मेरी ख्वाईशें

चिता के आहट से पहले
राख कैसे छा गया ?
वक्त का दीमक ये कब
परिंदे का पर खा गया ?
जा को जुगनू ने ही चुना था,
अब छिप गया क्यूँ खाल में ?

बुझने दो मेरी ख्वाईशें
रखा है क्या इन सवालों में...

भीड़ की हर शाखों पर,
फन्दों सी लटकी है क्यूँ टाई ?
सुलझे फीते वाले जूते,
कब भेंट दे गएँ तन्हाई ?
पंख वाले बुलबुलों ये कैसे ?
दब गएँ दीवारों में ?

बुझने दो मेरी ख्वाईशें
रखा है क्या इन सवालों में...

तनहा रोकर बारिशों में,
हौले हौले जल रहा,
तारों का सपना कभी था,
आज मैं ही ढल रहा...




Friday, January 09, 2009

Guilt Pleasure

Mercury was challenging the lowest limit of the year. I was shivering under the newly constructed flyover with some old memories and a gold flake in my hand. The flyover was my most significant and ambitious construction project till date. Completion of this flyover was had much to do this gold flake. Probably, this was my last fag.

Shadows and desires share at least one very common fact. They spread their wing of dominance in relation to their distance from light and reality. I started smoking, when I was in my second year of under graduation. Gold flake was least expensive and so the first choice of middle class bachelors. My existence without a gold flake was not imaginable those days. I shared my luck ,bad luck, job interviews, sad moments and happiness with that wrap. I associated smoking to my days of struggle and my days of graduating life.


After my graduation, I entered corporate battleground with waves of changes shaping my life style. Everything from my hair style to my shoe laces underwent a phenomenal change. I had separate wallets to carry my plastic money, currency notes and visiting cards. I attired in latest market brands and had my own car. Even, the gold flake found Marlboro as a new substitute.

Smoking and miracles always excited me. However, the idea to quit smoking was more fascinating and having some miraculous exit would have made it a masterstroke. I thought to jot down this script with some gaudy dialogues. However, I decided not to sweep off my old foot prints for showcasing my new pair of shoes and thus decided to tie off old poignant strings with a last puff of gold flake only.

The gold flake thought, like many of my other thoughts was very similar to few strange new relationships, which enter your routine accidentally, then follow you, haunt you, delight you and finally drive your steps. Although absurd, but I often design some reasoning to justify myself from these thoughts.


Memories and thoughts unfold their dimensions, when you are alone. I was sitting alone on a broken bench under the flyover with that probable last puff gold flake. Although, synchronization of events could not have witnessed better moment than that, but my mind was responding only to words of my college physics lecturer. His lessons denied existence of two objects at a same place at same time. For me, thoughts are also objects and today many of them were dwelling inside my mind. I could even sense all the needles of my wrist at the same place which was adding flavours to the mood of romanticism.

Tickers of my wrist watch and my trembling shoes were disturbing the grave silence of that ambience. I was waiting to meet the managing director of my construction company. He promised me to meet after his late-night show to discuss the latest most promising project of the company. Floods of thoughts were reverberating in my brain. I was looking at the ruins of that last gold flake. Suddenly, a car stopped in front of me. It was the managing director. When someone brings a ray of hope to you, your eyes start imagining halo around him. I could sense a similar halo around my managing director also.

He opened the door of car ,came near the bench and offered a cigarette to me. Every big discussion should start with spark and smoke. I hesitated for a moment, looked at the crushed butt of the probable last gold flake, smiled and accepted the new cigarette.


इतने संस्कार का अचार डालोगे क्या?

आप एक दिन अपनी गाडी लेकर सड़क पर जा रहे हैं; कुछ लोग आकर आपको ताना मारते हैं, कुछ गाली देते हैं और कुछ लोग आपके कार को तोड़ फोड़ देते हैं, बाद...