Wednesday, January 23, 2008

मैं और मेरा ये मन...


काले धागे को उलझकर जाल बुनता,
सूखे सपनों के तरू से डाल बुनता,
पापी, प्यासा या अभागा रिक्त है ये,
मन अकेला चिर्चिराता,
बुझती राखों को जला फिर चीख सुनता॥

प्रपंच में लिपटे हुए षड्यंत्र बुनता,
अहम को भेट करने मंत्र बुनता,
शतरंज के छोटे दाव पर पागल सा हँसता,
चिर्चिराता, चोट खाता,
बुझती राखों को जला फिर चीख सुनता॥


You told me what is life,
You taught me what is human,
Expressed me why to love,
Quoted me tons of reasons...

Now what, if I just know love,
I look only at one moon,
Am I so scary,
Am I so abrupt...

I lost my self in woods,
Puddling in the memories
shivering alone the whole night,
perplexed in untold stories

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.