Friday, September 07, 2007


शहर में गले मिल मिलकर ,
मेरी आदत बिगड़ गयी है,
गली में भौकता कुत्ता भी अब,
मुझे सगा सा लगता है॥

दरबाजो पर दस्तक देता हूँ उनके,
अंदर फिर कब्रिस्तान दिखता है,
मैं गलियों में बस खोजता हूँ कोना,
जन्हा कुछ ख़ुशी बिकता है..

आग में जलता चमकता इक चांद ठण्डा हो गया,
महफिलों में सजते- सजाते गन्दा अचानक हो गया।

कीचड़ में कमल पर चमकने को बेताब था,
कमल ना खिलने के भय से;
चुपचाप से वो सो गया।

विचारों की कच्ची सड़क पर,
पूल बनाने वाले बहुत हैं,
आधे रस्ते दौड़ कर ही अक्सर,
साँसे उनकी फूल जाती है।

नदियां पहाडो पर बहुत ही शोर करती है,
नीचे आते आते वो जज्बा सूख जाता है॥

सुबह को ताकना सूरज, अच्छी नींद दे भी दे,
तुमने पर कडी धूप का सोचा था;
अच्छी नींद ही प्यारी इतनी लगती है,
तो चौराहे के कुत्तों के संग सोया करो..

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.