Thursday, May 17, 2007

ये है मुम्बई मेरी jaaaaaaaaaaan.

चूल्हे पर सपना यंहा धुंए बिना जलता है,
बासी रोटी आधे सिगरेट से पेट यंहा पलता है।
नींद महंगी बिकती है ,तस्वीर धूल से हैं ढके,
मकरी के जाल मे संवेदना भी कब के थके ,

चुल्लू भर मैला पानी, खींचना गले तक,
आंसू भी असमंजस में हैं ,उष्मा उसके अब निरर्थक
परछाईं को कुचलती भीड़ भग दर में फँसी
नंगापन खूद का छिपाने भीख ली नकली हँसी

आकाश को चूमने, शमशान से सुबह निकलना ,
क्या चीज है तू जिंदगी,
कुछ रौशनी बस चूमने,
पल पल ये जलना ,बेबस पिघलना ।

तुम्हारे दीदार से मुक़म्मल होती थी वो कवितायेँ  जो आज कल अधूरी-अधूरी ही ख़त्म हो जाती हैं.