Monday, April 09, 2007

मेरे बचे शब्दों के कूछ अंश


अकेले आईने में अपनी सूरत को चिधाना,
बैठे बंद कमरे में कभी कुछ बुदबुदाना,
कभी आकाश को सोच मुट्ठी में,
ख़ुशी से झूमना बन पागल;
बेचैन होकर छट पटना बिस्त्रो में कभी,
और कभी मचलना ,बन प्यार का बादल।

हज़ारों स्वप्न पन्नों में सजाकर,
अक्सर संवेदन हीन फाड़ देते हैं,
अपनी कल्पना के शहर को,
चुपके से ,अपनी ही बेबसी में मार देते हैं॥

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...