Thursday, November 22, 2007

My moon my love


Those sleepless nights ,
I spent behind the door,
was misunderstood,neglected
but, the feelings were pure,
I wont love you my life ,
yeah will not hate you any more.....
It haunts me how ,
I made you to scare,
to toch you in dreams,
even never I did dare...
now I feel as I am a pissed off monster,
a shameless devil,
a dirty lobster.
hey, I will be the child heart
possesive as before..
I wont love you but,
will not hate you any more

Friday, November 16, 2007

मैं और मेरा ये मन


लड़खराते डगमगाते लम्हा लम्हा फिसल फिसल,
अरमान मेरे, बुलबुले हैं
मनाता रहा मैं ना तू निकल
खुली पगली नयनों में गिले सपने रह गये,
ख्वाबों कि स्याहियों में, पगले बदल बह गयें।

दिल को क्या मनाऊ,पगला मुझसे ही नाराज़ है,
चोट खाके भी नासमझ को प्यार की तलाश है,
चाँद के पीछे उड़ता ,दौड़ता ये थक गया,
धीमी धीमी आंच में धीमा सा ये सुलग गया।

मनाता रहूँ रात भर, दिल बहल तो जाता है,
तेरी याद जैसे आई, फिर से फिसल जाता है;
मैं ना रोकूँ पगले तुझको, अब रुला के भाग जा,
एक बार रो चूका तू, मैं ना अब रुला सकूँगा॥

पगले मन ,लुक्का छिपी खेलते है फ़लक फ़लक,
मनाता रहूँ तुझको मैं, मुझे तू शाम तक॥
फलक फलक शाम तक,
निष्पलक शाम तक..









Monday, November 12, 2007

philosophy..ha ha ha


Wallowed in darker moods,
despised men and all the women.
disgusted,sometime I fraternized,
to get me fallacious proven.

Now,I fear to plumb my words,
I shiver to fathom religions,
they laugh at it calling philosophy,
I fear to knock their doors.

I smoked ."no smoking"

When the nights got stormy,
dictionary over my table wobbled,
I peeped through it ,
for appropriate words..
alas ,have not got them yet.

I stumbled over text and pages,
pondered of joy and rages,
the fags and smoke are left,
my thirst is yet to quench..

Friday, November 09, 2007

और मैं अकेला घूमता रहा..


सिगरेट के छल्लों से जलने की ख्वाइश,
ख्वाबो के शीशे का बेदर्द चनकना,
काले छल्लों की निष्प्राण दुनिया है मेरी,
बेतुके शब्द बुदबुदाता हूँ दिनभर

धक्के लगा कर गिरा दो मुझे,
बेइज्जत खुले आम कर रुझा लो मुझे,
पिछली महफ़िल मैं कीडा बना था,
इसबार कुचल के रुला दो मुझे

पन्ने पलटता हूँ, फिर बेचैन होकर,
बिस्तर से दरवाजा, दरवाज़े से बिस्तर,
गीली स्याही सताती है मुझको,
कभी आइना हँसता है दिनभर...

उजली दीवारें ,काला सा चक्का,
रेशम के कपडे, गुलाबी सी दुनिया;
जलाकर फिर से बुझाता रहूंगा,

तुम्हारी बस्ती मे, मेरी दोस्ती है;
हंसी अपनी उड़वाने जाता रहूंगा,
सिगरेट मेरी जलती है जबतक,
ख्वाओं को तब तक जलाता रहूंगा..

ये "हम लोग" वाले लोग जब inert या blind हो जाते हैं तो स्थिति बहुत डरावनी हो जाती है|

एक और 15 अगस्त आने वाला है| बहुत कुछ वैसा ही होगा, जैसा हर साल होता है| Facebook और twitter पर profile picture बदल दिए जाएंगे; whatsapp पर ...